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ख़ुशवंत की बात…

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भारतीय पत्रकारिता की सबसे बुजुर्ग हस्ती खुशवंत सिंह अब दुनिया से विदा लेना चाहते हैं. 98 वर्ष के हो चुके खुशवंत कहते हैं, अब समय आ गया है कि वह अपने बूटों को टांग दें, एक बार पीछे मुड़कर देखें और अंतिम यात्रा के लिए तैयार हो जाएं. लेकिन जिंदगी यह सिलसिला खत्म करने की इजाजत ही नहीं देती.

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ख़ुशवंत की बात…

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भारतीय पत्रकारिता की सबसे बुजुर्ग हस्ती खुशवंत सिंह अब दुनिया से विदा लेना चाहते हैं. 98 वर्ष के हो चुके खुशवंत कहते हैं, अब समय आ गया है कि वह अपने बूटों को टांग दें, एक बार पीछे मुड़कर देखें और अंतिम यात्रा के लिए तैयार हो जाएं. लेकिन जिंदगी यह सिलसिला खत्म करने की इजाजत ही नहीं देती.

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दुष्यंत की प्रासंगिकता आज और बढ़ रही है

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दुष्‍यंत कुमार

दुष्यंत कुमार की शायरी का जादू आज भी युवाओं के सिर चढक़र बोलता है। केवल 42 वर्ष के जीवन में दुष्यंत कुमार ने अपार ख्याति अर्जित की। दुष्यंत ने आम आमदी की भाषा में ही उसके दुख-दर्द को बयान किया। आज उनका जन्मदिन है…

समकालीन हिंदी कविता विशेषकर हिंदी गजल के क्षेत्र में जो लोकप्रियता दुष्यंत कुमार को मिली वो दशकों …

तुम्‍हारे नाम…

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कैसे हो ? मेरे कूच के वक्त मेरी तबियत पर जो बार था उसकी फ़िक्र है। खुदा करे अच्छी तरह सो गए हो और सुब्ह बश्शाश (खुश) उठे हो।
इस मर्तबा ग्वालियर के स्टेशन पर हर लहज़ा (क्षण) दिल चाहता था कि काश कोई खारजी कुव्वत (बाह्य शक्ति) जाने से रोक लेती और अपने पर से जिम्मेदारी का बोझ हट जाता, मगर संग-दिल ट्रेन आकर रही और बेरहम लोगों ने टिकट भी हासिल कर लिया और सफ़िया को दूर फेंक दिया, गो कि वो इसके बावजूद तुमसे ज़रा भी दूर नहीं।

अपनी बात कहता हूँ

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विमल कुमार हिंदी के पाठकों के बीच एक जाना-पहचाना नाम हैं. लिक्खाड़ पत्रकार हैं, तमाम पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य और साहित्येतर विषयों पर उनके लेख और टिप्पणियां प्रकाशित होती रहती हैं. अच्छे कवि भी हैं और कविता के लिए 1987 में ही भारत भूषण पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं.

मंटो-एक ऐसा लेखक जो मर कर भी मरा नहीं

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आप मुझे एक अफसाना निगार (कहानीकार) के रूप में जानते हैं और अदालतें एक फोहश निगार (अश्लील लेखक) की हैसियत, से। सरकार मुझे कम्युनिस्ट कहती है और कभी देश का सबसे बड़ा अदीब। कभी मेरे लिए रोजी के दरवाजे बंद किए जाते हैं और कभी खोले जाते हैं।

आशा-निराशा

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बलराज साहनी बेहतरीन अदाकार होने के साथ साथ साहित्यकार भी थे, यह बात और है की उन की लिखी कहानी हंस पत्रिका के संपादक ने वापिस भेज दी थी. पेश हैं उनकी कुछ कविताएं…

सुरेश सेठ के नॉवेल ‘सुलघती नदी’ की पहली पढ़त

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सुरेश सेठ का नाम उन साहित्यकारों में शुमार है, जिन्होंने पंजाब में रहकर हिंदी साहित्य में भरपूर योगदान दिया। एक समय में उनकी रचनाएं ‘सारिका’ और ‘धर्मयुग’ जैसी पत्रिकाओं में जगह पाकर खूब पढ़ी गईं।

प्रवीन शाकिर

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24 नवंबर 1952 में पाकिस्तान में जन्मी परवीन शाकिर के अल्फाज की खुश्बू से सारी दुनिया अब तक महक रही है. पाकिस्तान की मशहूर शायरा परवीन शाकिर के कलाम की खुशबू ने न केवल पाकिस्तान, बल्कि हिंदुस्तान की अदबी फिज़ा को भी महका दिया.